आराध्यों का शहर : जयपुर छोटी काशी : जयपुर घाट-घाट आराध्य मंदिरों की गुलाबी नगरिया

शहर के बीच मंदिरो का होना तो एक आम बात है लेकिन मंदिरों के बीच शहर होने की खासियत गुलाबी नगरी में ही देखी जा सकती है। हर गली, हर मोड़ शहर के हर हिस्से में श्रद्धा आपूरित इन मंदिरों और शहरवासियों की आराधना भाव ने जयपुर को छोटी काशी के नाम से दुनिया में विख्यात कर दिया है। परकोटे के बाजारो में सड़क के बीचो-बीच बने कई मंदिरों को देखकर अनायास की मन में ख्याल आता है कि धन्य है जयपुर की ये रमणीय माटी, जिसमें ईश्वर भी जहां चाहा है बैठ गया है और शहरवासी धन्य है, और छोटी काशी के बड़ श्रद्धावान जो सड़क के बीच बैठे देव का भी निरादर नहीं बल्कि पंक्ति बद्ध होकर अभिषेक के लिए लालायित रहता है। यकीन नहीं तो किसी गुरूवार का चौड़ा रास्ता में सड़क किनारे स्थित सांई बाबा मंदिर के सामने लगी आस्थावालों की भीड़ देख लीजिये या किसी शनिवार को चांदपोल बाजार में खेजड़े की छांव में विराजित शनिदेव का तैलाभिषेक करने उमड़े श्रद्धालुओं को। आस्था और भक्ति के ये अद्भुद् नजारे सिर्फ जयपुर में ही देखे जा सकते हैं। जिस श्रद्धा से यहां चन्द्रमहल के सामने बड़े ठाठ-बाट से विराजित गोविन्द देव जी और मोती डूंगरी पर शान से बैठे गणेश जी महाराज पूजे जाते है। उसी भावना से सड़क किनारे छोटी गुमटी में दुबके देव भी पूजित होते है।

अराधना जयपुर की आत्मा में निवास करती है। जयपुर में सिर्फ प्राचीरों और भवनों को भव्य दिखाने के लिए वैज्ञानिक और आधुनिक नगर-नियोजन तकनीक नहीं अपनाई गई थी बल्कि अपने अराध्य गोविन्द की मूर्ति को आक्रान्ताओं से बचाते हुए यहां इस नगरी में ले आया गया था और स्थापित किया राजा ने अपने महल के ठीक सामने  ताकि सुबह उठे तो अपने अराध्य को अपने समक्ष पाए। आराध्यों की इस नगरी के अराध्य गोविन्द को उसके प्रियवरों ने संकट से बचाया। अराध्य देव तो अपने भक्तों को से हमेशा उबारते  हैं। लेकिन भक्त द्वारा भगवान को संकट से  बचाने सहेजने के किस्से जयपुर के अलावा कहाँ सुने जो सकते है? शायद कहीं नहीं। इतनी निराली है अपनी ये पिंकसिटी।