जयपुर के पद्मश्री

padma-shree-awarded

अर्जुन प्रजापति
जयपुर के पद्मश्री प्राप्त ख्यातनाम हस्तियों में अर्जुन प्रजापति एक हैं। पत्थर हो, मिट्टी हो या प्लास्टर ऑव पेरिस जब अर्जुन के हाथों से छुए जाते हैं तो मूर्तियां जैसे बोल पड़ती हैं। अर्जुन ने कॅरियर की शुरूआत एक आम मूर्तिकार की ही तरह की, लेकिन उन्होंने इस कला में जो प्रवीणता हासिल की उसने उन्हें मूर्तिकला का अर्जुन बना दिया। वर्ष 2010 में उनकी इस अद्भुद कला की कद्र करते हुए सरकार ने उन्हें पद्मश्री के सम्मान से नवाजा। अर्जुन ने जयपुर की इस आर्ट को प्रमोट करने के लिए अर्जुन आर्ट गैलेरी का भी आरंभ किया है। जो उनकी कला और शिल्प के म्यूजियम की तरह है। अर्जुन प्रजापति को 2010 में राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटील के हाथों पद्मश्री का सम्मान मिलने से पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन, पूर्व प्रधानमंत्री आई के गुजराल, पूर्व महाराजा स्व. सवाई भवानी सिंह द्वारा गौरवपूर्व सम्मान दिए गए। वर्ष 1983 में उन्हें राजस्थान ललित कला अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
अर्जुन ने अपने हतप्रभ कर देने वाले शिल्प से विश्व की बड़ी हस्तियों को भी चौंकाया है। उन्हें अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को उनका ही स्कल्पचर भेंट कर मीडिया में सुर्खियां बटोरी थी। क्ले, सिरेमिक, मार्बल और सेंडस्टोन से बने उनके आर्ट की विेदेशों में प्रशंसा भी होती है और मांग है। अर्जुन जैसे कलाकारों ने ही जयपुर का नाम दुनिया के नक्षे पर स्वर्ण से लिखा है। जयपुर को उनपर गर्व है।

लिम्बाराम
उदयपुर में जन्मे लिम्बाराम की कर्म भूमि जयपुर रहा। तीरंदाजी में आज का अर्जुन कहलाने वाले लिम्बाराम की कहानी युवाओं को यह संदेश देती है कि ईश्वर प्रतिभा दे सकता है लेकिन सफलता की राह कठोर संघर्ष से गुजरकर ही मिलती है। लिम्बाराम को इसी वर्ष पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है। लिम्बा राष्ट्रीय स्तर के तीरंदाज खिलाडी हैं और ओलंपिंक सहित कई अंतर्राष्ट्रीय खेल आयोजनों में देश का नाम रोशन कर चुके हैं। वर्ष 1992 में बीजिंग में हुए एशियन चैम्पियनशिप में लिम्बाराम के तीरों का जादू ऐसा चला कि देश में उनके नाम का डंका बज उठा। कौन कह सकता था कि अहारी जाति का वह गरीब बच्चा अपनी भूख मिटाने के लिए मजबूरी में जिन परिंदों पर तीर से सटीक वार कर भोजन जुटा रहा है, वो एक दिन देश का नाम विदेशों में रोशन करेगा।
राजस्थान में उदयपुर की झाडोल तहसील के भी बहुत छोटे से गांव में जन्मे इस वनवासी बच्चे ने अपनी विषम आर्थिक परिस्थितियों से जूझते हुए प्रतिभा और कड़े संघर्ष से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान कायम की। वर्तमान में वे राष्ट्रीय तीरंदाजी टीम के कोच हैं। पद्मश्री मिलने से पूर्व वे 1991 में अर्जुन पुरस्कार से भी नवाजे जा चुके है।

इरफान खान
रंगमंच से बॉलीवुड तक का सफर तय करने वाले मंझे हुए कलाकार इरफान खान जयपुर के युवाओं का प्रेरणास्रोत हैं। वर्ष 2011 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। शाहबजादे इरफान अली खान का जन्म 7 जनवरी 1967 को हुआ। बचपन जयपुर परकोटा की गलियों में बीता। बचपने से गंभीर स्वभाव और काम की तल्लीनता ने इरफान को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दी। लेकिन यह पहचान उनके कड़े परिश्रम के बाद बहुत मंद और मंथर गति से मिली, इरफान ने कभी हार नहीं मानी और कभी पीछे नहीं मुडे़। रंगमंच के साथ ही दूरदर्शन और फिल्मों में वे अभिनय करते रहे। द वारियर, मकबूल, हासिल, रोग और द नेमसेक जैसी फिल्मों में उन्होंने अपने अभिनय की दक्षता और गहराई को सिद्ध किया। वर्ष 2004 में हासिल के लिए उन्हें श्रेष्ठ खलनायक की भूमिका का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। बॉलीवुड की फिल्मों का अद्र्धशतक लगाने के करीब पहुंच चुके इरफान ने ’ए माईटी हार्ट’, ’स्लमडॉग मिलियनेयर’ और ’द अमेजिंग स्पाइडर मैन’ जैसी हॉलीवुड फिल्मों से अपना कद बहुत बड़ा बना लिया है। हाल ही ’पान सिंह तोमर’ में पानसिंह का किरदार निभाकर इरफान आलोचकों की आंखों का तारा बन गए हैं। लेकिन आज भी वे बहुत ही सामान्य व्यवहार के लिए जाने जाते हैं। जयपुर की गलियों ने इतने धीर, परिश्रमी और मंझे हुए कलाकारों को अपने आंचल में पालकर ही इस लायक बनाया है।

पी के सेठी
प्रमोद करन सेठी भारतीय ऑर्थोपेडिक सर्जन थे। 28 नवम्बर 1927 में जन्मे सेठी ने रामचंद्र शर्मा के साथ मिलकर ’जयपुर फुट’ का निर्माण किया था। वही जयपुर फुट जिसने राज्य, देश और बाहरी कई देशों में हुए विभिन्न हादसों में अपने पैर खो देने के बाद दुबारा अपने ही पैरों पर खड़े होकर चलने का हौसला दिया। 1969 में इजाद किए गए उनके इस चमत्कार ने आशाएं खो चुके हजारों लोगों को नया जीवन दिया है। उनके इस अभूतपूर्व कार्य के लिए भारतीय सरकार ने उन्हें 1981 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा और इसी वर्ष उन्हें मैग्सेसे पुरस्कार भी मिला। आध्यात्मिक नगरी वाराणसी में जन्मे सेठी की कर्मभूमि छोटी काशी जयपुर रही। 1958 में उन्होने जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ की भूमिका में अपना कार्य आरंभ किया। हादसों में अपना पैर खो चुके लोगों के लिए उनके मन में यही खयालात आते थे कि किसी तरह वे उन मरीजों को अपने पैरों पर दुबारा खड़ा होते, चलते फिरते, दौड़ते और जीवन से दो दो हाथ करते देखें। उनकी इसी भावना ने उन्हें जयपुर फुट जैसी रचना करने के लिए प्रेरित किया। और वे सफल भी रहे। उनके इस आविष्कार पर दक्षिण भारत में एक फिल्म बनी, उस फिल्म में अभिनेत्री और नृत्यांगना सुधा चंद्रन ने काम किया था, यही फिल्म हिन्दी में ’नाचे मयूरी’ नाम से भी बनी। सुधा चंद्रन अपनी रियल लाईफ में एक हादसे में अपना पैर खो चुकी थी। उन्होंने जयपुर फुट के बारे में सुना था, उन्होंने जयपुर फुट लगवाया और एक बार फिर अभिनय और नृत्य की यात्रा आरंभ की। उन्हें की जीवन पर बनी फिल्म ने जयुपर फुट को रातों रात लोकप्रिय बना दिया। और विदेशों से भी मरीज जयपुर फुट के लिए यहां आने लगे। रबर और लकड़ी से बना यह नकली पैर दुनिया का सबसे सस्ता प्रोस्थेटिक लिंब है। डॉ सेठी के इस सपने को एक अनपढ क्राफ्टमैन रामचंद्र शर्मा ने अपनी कला से जीवंत रूप दिया था।

यहां डॉ डी.आर. मेहता का  जिक्र करना भी उचित रहेगा। 1937 में जोधपुर में जन्मे डॉ मेहता सिक्यूरिटीज एण्ड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन रहे। उन्होंने जयपुर में भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति की स्थापना की। विकलांग लोगों की सहायता करने वाली यह दुनिया की  सबसे बड़ी संस्था है। समाजसेवा क्षेत्र से जुड़े डॉ मेहता ने इस संस्था के माध्यम से हजारों  विकलांगों को उनके अपने पैरों पर खड़े होने के सपने को साकार किया है। भारत  सरकार में अनेक प्रशासनिक पदों को सुशोभित कर चुके डॉ मेहता की समाजसेवा की इसी भावना और कार्य का आदर करते हुए सरकार ने उन्हें पद्मभूषण सम्मान से नवाजा है।

पं. झाबरमल शर्मा
पं. झाबरमल शर्मा ख्यातनाम पत्रकार और इतिहासकार थे। उन्होंने हिन्दी में इतिहास की अनेक पुस्तकें लिखीं। महाराणा मेवाड अवार्ड से सम्मानित पं. शर्मा  को 1982 में पद्मभूषण सम्मान से नवाजा गया। ’गुलेरी ग्रंथावली’ के तीनों संस्करण और ’सीकर का इतिहास’ उनकी श्रेष्ठ रचनाएं हैं। पं शर्मा की  स्मृति में राजस्थान पत्रिका और माखनलाल चतुर्वेदी नेशनल जर्नलिज्म यूनिवर्सटी, भोपाल में स्मृति आख्यान के कार्यक्रम हुए। झाबरमल शर्मा म्यूजियम एंड जर्नलिज्म रिसर्च सेंटर, जयपुर की ओर से पं. झाबरमल शर्मा जर्नलिज्म अवार्ड भी दिया जाता है। साहित्य को उनकी महान देन के कारण राजस्थान मंच की ओर से 1977 में ’पं झाबरमल शर्मा अभिनंदन ग्रंथ’ प्रकाशित किया गया था।

पं. विश्वमोहन भट्ट
अपनी मोहनवीणा की मोहनी झंकारों से जयपुर के शास्त्रीय संगीत को नए आयाम देने वाले पं विश्वमोहन भट्ट एक ’इंडियन स्लाइड गिटार’ प्लेयर हैं। उन्होंने वीणा को नया रूप देकर एक नया वाद्य यंत्र इजाद किया ’मोहन वीणा’। 1994 में हिन्दुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक में परफोर्म कर उन्होंने दुनिया का मन जीत लिया और उन्हें ’गे्रमी अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। उनका ग्रेमी विनिंग एलबम था ’ए मीटिंग बाइ द रिवर’। यह अलबम उन्होंने आरवी कूडर के साथ तैयार किया था। 2004 में एरिक क्लैपटन की ओर से आयोजित क्रॉसरोड्स गिटार फेस्ट में भी उन्होंने अपनी दमदार प्रस्तुतियां दी थी। 1998 में उन्होंने संगीत नाटक अकादमी प्राप्त किया जबकि 2002 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया।

जसदेव सिंह
जयपुर की इंजीनियर्स फैमिली के जसदेव ने जब कमंटेटर बनने की इच्छा जाहिर की तब उनकी मां शॉक्ड थी। उसपर अंग्रेजियत के माहौल में पले-बढ़े जसदेव का हिन्दी और उर्दू में कमेंट्री करने का ख्वाब। लेकिन ख्वाब तो ख्वाब है। जसदेव ने अपने ख्वाब को पंख दिए और बन गए देश के सबसे जाने-माने, सुने गए कमंटेटर। गांधी जी की गोली मार कर की गई हत्या के बाद रेडियो पर मेल्विले डे मेलो द्वारा सुने शब्द उनकी रूह को छू गए। बस, ठान लिया कि अब कमेंटेटर ही बनना है। उन्होंने 1963 से दिल्ली में मनाए जाने वाले रिपब्लिक डे की कमेंट्री की। और उनकी आवाज लोगों की आत्मा में रच बस गई। दूरदर्शन  और आकाशवाणी पर उन्होंने लोकप्रियता के  कीर्तिमान अर्जित किए। 1985 में उनकी बेहतरीन सेवाओं के लिए पद्मश्री का सम्मान दिया गया, इसके बाद 2008 में पद्मभूषण भी। उनकी पहचान इंडिपेंडेंस डे और रिपब्लिक डे के ऑफिसियल कमंटेटर के रूप में बनी। 1955 में ऑल इंडिया रेडिया, जयपुर  से उन्होंने अपनी यात्रा आरंभ की। इसके बाद वे दिल्ली चले गए और वहां दूरदर्शन ज्वाइन किया। इस तरह उन्होंने प्रसार भारती को 35 से ज्यादा वर्षों तक सेवाएं दी। उन्होंने अपने कॅरियर में नौ ओलंपिक, आठ हॉकी वल्र्डकप और छह एशियन गेम कवर किए।

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.