मेरी यात्रा-जयपुर

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मैं जयपुर हूं। आज इच्छा है आपसे बातें करने की। बहुत सी बातें। एक शहर को अपने वासियों से बातें करनी ही चाहिएं । हम शहरों का हिसाब इंसानों की उम्र से उल्टा होता है। आज मैं 285 बरस का हो गया हूं। आपको लगता है कि मैं बूढ़ा हो गया हूं। लेकिन शहर बूढ़े नहीं होते। उम्रदर-उम्र हम जवान होते हैं। वक्त जैसे-जैसे आगे बढ़ेगा मैं जवान होता जाऊंगा।

मुझे अपने आप से बहुत प्यार है। सच। इसका ये अर्थ नहीं कि मैं अभिमानी हूं। बल्कि मैं ये सोचता हूं कि मैं खुद से प्यार करूंगा तो अपनी धमनियों में बसे, मेरी रगों में दौड़ते अपने बच्चों से प्यार कर पाऊंगा। आज वहीं प्यार हिलोरे मार रहा है। इसीलिए इच्छा है आप सबसे बात करने की। मेरे बच्चों।

मैं जब आमेर के गर्भ में था, तब मेरे आका ने मुझे बहुत सुंदर बनाने की कल्पना की। एक समृद्ध पिता बच्चे की बेहतरी के लिए हमेशा पूर्वयोजनाएं बनाता है। मेरे जन्म से पूर्व  भी बनी। विद्याधर भट्टाचार्य जी सरीखे अनेक विद्वानों ने आका से लम्बी चर्चाएं की, वास्तु और ज्योतिष के आधार पर मेरी ईंट-ईंट गढ़ने के लिए आका ने दुनियाभर के बेहतर ग्रथों के अनुवाद कराए।

आखिर, मेरा जन्म हुआ। यज्ञ और वहन के साथ देवताओं से इस पुण्य कार्य में उपस्थित रहने के आव्हान हुए। हजारों दक्ष कारीगर मजदूर एक साथ लगे। चार साल में तो नौ चौकडि़यां, बाजार और प्राचीरें खड़ी हो गए। भव्य राजप्रासाद बीचों बीच। उन दिनों मेरी सड़कें लाल मिट्टी की हुआ करती थी। इतना नपा-तुला पूरा का पूरा शहर। लोग दांतों तले अंगुली दबाकर कहने लगे-’भई सूत से  नापें तब भी एक बाल के बराबर अंतर ना आए।’

लेकिन जनाब ! आका को पता था! जन्म देना सहज है! लालन-पालन बड़ा ही मुश्किल। तो ? ऐसा क्या किया जाए कि मेरा लालन-पालन बेहतर हो और मैं दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करूं ? जवाब बड़ा आसान था। आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए व्यापार और  वाणिज्य को बढाया जाए। यह बात जन्म से पूर्व की योजनाओं में शामिल थी। इसीलिए तो राजप्रासाद के चारों ओर बाजार विकसित हुए थे। और व्यापार भी ऐसे कि सारी दुनिया भागी चली आए यहां का माल खरीदने। आंखें चौंधिया जाएं पूरी दुनिया की। जौहरी बाजार- किशनपोल- त्रिपोलिया- गणगौरी- रामगंज- चांदपोल। सभी बाजार एक से एक। 285 बरस की उम्र का एक तजुर्बा होता है। मेरा भी  तजुर्बा  है, यही कि जिस्म  सुंदर हो या ना हो रूह सुंदर होती चाहिए। और मेरी रूह कौन। आप। आप सब। जो इस जिस्म में बसे हो। सर से लेकर पांव तक। सूरज के एक पोल से चांद के दूसरे पोल के भी पार। देखता हूं परकोटा के दरवाजे सड़कों में धंस गए हैं। ये मेरी झुर्रियां हो सकती हैं- चांदपोल की  एक दीवार को हिस्सा ढह गया है- ये मेरे जख्म हो सकते हैं। लेकिन मुझे इन झुर्रियों, जख्मों की इतनी चिंता नही है। ये मिट जाएंगे-भर जाएंगे। लेकिन अभी कुछ एकाध  बरस पहले मेरी रूह पर चोट हुई। मेरे बच्चों पर।

सोचिए कैसा लगा होगा मुझे ? मैं जब देखता कि किशनपोल से मेरे बच्चे साईकिलें खरीदकर मेरी गलियों में चलाना सीखते- भाग-दौड़ करते- खिलखिलाते आगे-पीछे एक दूसरे को पकड़ने की कोशिशों में जब गिर-पड़ जाते तो मेरी आह निकल जाती थी। तसल्ली भी होती  थी कि बच्चों पर गिरने के गम का नामोनिशान नहीं- बस फिर से उठकर साईकिल रेस में आगे निकल जाने की ललक है। 13 मई 2008 की वो शाम याद है मुझे। लेकिन एक बार फिर मेरे बच्चों ने मुझे तसल्ली दी। गिरे- जख्मी हुए- जान से गए- लेकिन अधीर नहीं हुए- उठे- फिर चले और एक खिलखिलाहट के साथ दौड़ में शामिल हो गए।

मैने मेरी यादों में बहुत कुछ समेट रखा है। अच्छे से याद है जब 1876 में मेरे आका सवाई रामसिंह ने मुस्कुराकर आदेश किया था- *इंग्लैण्ड की महारानी और एडवर्ड हमारे मेहमान हैं- हमारा शहर उन गुलाबी मेहमानों से ज्यादा गुलाबी नजर आए- उनके स्वागत का इससे बड़ा उपहार क्या होगा।’

मैं देर तक खिलखिलाया था उस दिन। आकाश के दर्पण में बार बार अपने नए गुलाबी चेहरे पर इतराया था। मेरा इतना खूबसूरत मेक-अप किया था। गेरुएं रंग की वो इकसार शक्ल आज भी याद है मुझे। आज शायद मेरे बच्चों की सोच की तरह गुलाबी रंग भी कई हिस्सों में बंट गया है।

उससे पहले की भी एक बात सुनाता हूं। 1857 की क्रांति हुई थी। मेरठ से चिंगारियां उठी थी। मेहमान तो मेहमान। यहां बसे अंग्रेज अधिकारी और उनके बच्चे डर से कांप रहे थे। सारे देश में उनपर हमले हो रहे थे। मैं उस वक्त दुविधा में था। राष्ट्र से मुझे भी प्रेम था, लेकिन मेहमान को मारना-काटना। गलत लगा मुझे। आका को भी गलत लगा। आका माधोसिंह ने नाहरगढ़ के रास्ते भयभीत गोरे मेहमानों और उनके परिवारों के लिए खोल दिए। उनकी हिफाजत में जब पहाड़ी के जंगलों में मेरे पठान पहरेदारों को चौकसी करते देखता तो अजीब सा सुखद एहसास होता। नाहरगढ़ के ओपनथिएटर या बावड़ी के आसपास मेहमानों के बच्चों को खुशी में किलकारियां मारते- खेलते-कूदते देखता तो अजीब सा सुकून मिला मुझे।

एक-एक पल- एक-एक बात याद है मुझे। चांदपोल के बाहर खड़ी बैलगाडि़यां, तोप गर्जना सुन खुलने के बेताब दरवाजे- तेल डलने का इंतजार करते बुझते दीप-पोल। चौड़ा रस्ता में हेड़े की जीमणवार के गहमागहमी भरे माहौल में जूतियां बगल में दबाए मासूम चेहरे। आज के बापू बाजार, नेहरू बाजार की वो पटरी जिसपर कचरा ढोया जाता था।

मस्त माहौल था। डर भी था। मराठों का भी- अपनों का भी। सात सेनाएं बढ़ी थी मेरी ओर। ईश्वरीसिंह मेरे आका थे उन दिनों। हरगोविंद नाटाणी सेनापति, जिनके खेसे में सेनाएं हुआ करती थी। युवा आका का हुक्म बजा और नाटाणी ने सातों दुश्मनों को बगरू के मैदान में धूल चटाई। इसरलाट को देखता हूं तो पल याद आ जाते हैं।

कभी कभी बुरा वक्त भी आया। लेकिन वह आपसे साझा नहीं करूंगा। आप बहुत व्यस्त रहते हैं। आपको इतना समय भी कहां कि आप मेरी सारी बातें सुनें। देखा है मैने कई घरों में झांक कर। बूढ़ों की बेकद्री होते। मैं कितना ही अपनी नजर में अपने आपको युवा महसूस करूं। नजरों के पार तक फैली इमारतें देखूं- काली चौड़ी सड़कें और नीले शीशे की भव्य बिल्डिंगें देखूं- आस्मां चूमते मेट्रो के खंभे देखूं- पहाडि़यों को छेदकर निकाली गई सुरंगें देखूं। आसपास के गावों तक पहुंची इमारतों के झुंड देखूं। लेकिन। आप तो मुझे बूढ़ा समझते हैं ना।

कोई बात नहीं। आप जैसा समझें। हूं तो आपका। बस इतनी सी बात और है कि कभी कभी मन खराब हो जाता है मेरा। मेरे आकाओं का चेहरा पहले साफ था। अब पता ही नहीं पड़ता आका कौन। हर गली में एक आका। मुझे सुंदर बनाने के की मशक्कतों में जब उन्हें हाथ में जूते-चप्पलें एक दूसरे पर उछालते- लात-घूंसे चलाते देखता हूं तो समझ नहीं पाता- हंसूं या रोऊं।

बच्चों- तुम खुश रहो- आबाद रहो। मेरी बस यही इच्छा है। हां, मुझे बहुत अच्छा महसूस होता है जब पान खाकर कोई मेरी गर्वीली दीवार पर थूकने से अपने आप को रोक लेता है- जब किसी महल के सुनसान कोने में एक दोस्त दूसरे दोस्त को दीवार पर कुछ लिखने से रोक देता है- जब टॉफी खाकर कोई बच्चा रैपर को जेब में रख लेता है- जब हादसे में कहीं किसी छटपटाते किशोर को कोई युवा भागकर संभालता है-अस्पताल पहुंचाता है। जब पिता से प्रेरित कोई छोटा बच्चा रैनबसेरे के बाहर फुटपाथ पर सोए गरीब पर गर्म कंबल डालता है-तो अच्छा लगता है।

तुम्हें ईद-दीवाली-बैसाखी-बड़ा दिन खुशी से मनाते देखकर अच्छा लगता है। तुम सब मेरी रूह हो- मेरा चेहरा संवरें ना संवरे- मेरी रूह उतनी ही पवित्र और गर्व करने लायक होनी चाहिए जितनी मेरे आका ने इसे बनाने की कल्पना में दुनिया महान ग्रंथों का अनुवाद कराकर लगन से पढ़ा था।

अब तो नई विधानसभा में कितने सारे आका हैं। मेरी सूरत मेरी रूह बहुत बेहतर बना सकते हैं। स्टेच्यू सर्किल पर खडे मेरे पहले आका मेरे पिता उन्हें पीठ दिखाकर नहीं खड़े हैं। वे बस यही सोचते हैं कि आज के आका उनके पीछे पीछे चलकर मुझे और बेहतर और खुश देखने  की चाह में लगातार अच्छी कोशिशों में जुटे हैं।

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