जयपुर स्थापना समारोह में ’तमाशा’

-प्राचीन लोक नाट्य शैली दिखाई दी

जयपुर अपनी सांस्कृतिक गतिविधिओं और कलाओं के संरक्षण-पोषण कारण जाना पहचाना और माना जाता है। जयपुर कलाओं का शहर है। ऐतिहासिक कलाओं का यहां चप्पे-चप्पे पर राज है। कुछ कलाएं हैं जो आज व्यावसायिकता के रंग में रंग गई हैं और देश-विदेश में अपनी पहचान कायम रखते हुए अपना वजूद स्थिर रख पाई हैं। जैसे जयपुर की रजाई, जयपुर की मोजड़ियां, कठपुतली या फिर कालबेलिया नृत्य। ये ऐसी कलाएं हैं जिन्होंने अपनी ब्रांडिंग अपने तरीके से कर सांस्कृतिक पहलुओं को संभालकर रखते हुए व्यावसाय का नया आधार भी अपने लिए तैयार कर लिया है। लेकिन इसी जयपुर में कुछ कलाएं हैं जो अपना ऐतिहासिक महत्व और जयपुर की उपज होकर भी उपेक्षित हैं और अपने वजूद के लिए लड़ रही हैं। जयपुर की ऐसी ही एक विरासत और संस्कृति का हिस्सा है- तमाशा शैली।
इस शैली के तहत किसी लोक कथा को कलाकारों द्वारा गायन-वादन और नृत्य के जरिए बहुत ही संक्षेप भाव से प्रस्तुत किया जाता हैं। इस शैली में अभिनय से ज्यादा कथा की गेयता और गायन-वादन से हुई उसकी प्रस्तुति ही महत्वपूर्ण होती है। जयपुर के स्थापना दिवस समारोह में तमाशा शैली का एक नाट्य देखने को मिला।

’गोपीचंद्र भृतहरि’ का लोक तमाशा-
जयपुर स्थापना समारोह के दूसरे दिन सोमवार 19 नवम्बर को भी शहर में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन हुए। जयपुर नगर निगम, राजस्थान फोरम और त्रिमूर्ति संस्था के सहयोग से हो रहे स्थापना समारोह में सोमवार की शाम ब्रह्मपुरी के छोटा अखाड़ा में परंपरा नाट्य समिति की ओर से लोक नाट्य ’ गोपीचंद भृतहरि ’तमाशा की प्रस्तुति की। लोकनाट्य दिलीप भट्ट के निर्देशन में खेला गया। नाट्य प्रस्तुति में स्वयं दिलीप भट्ट, गोपेश भट्ट, गोविंदनारायण भट्ट, ईश्वरदत्त माथुर और सचिन भट्ट ने भूमिकाओं का निर्वहन किया।
तमाशा जयपुर की प्राचीन लोक परंपरा है। जिसे भट्ट परिवार ने कई पीढ़ियों से सहेज-संभाल कर रखा है। दिलीप भट्ट रंगमंच के जाने-पहचाने नाम हैं और अपनी परंपरा तमाशा शैली को ’परम्परा नाट्य समिति, जयपुर’ के सहयोग से संभालने-संवर्धन के प्रयास में लगे हुए हैं।

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