दुनिया भर में मशहूर जयपुरी रजाई

-सौ ग्राम रूई की रजाईयों की मांग

जयपुर में दीवाली के बाद सर्दियां अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं, रातों का तापमान गिरने लगता है और सुबह शाम की गुलाबी ठंड सिहरन पैदा करती है। गुलाबी नगरी की इसी गुलाबी ठंड में जयपुर की रजाईयां मौसम को कलात्मक ढंग से महसूस करने की शिद्दत प्रदान करती हैं। जयपुर की कलाएं दुनिया में नाम रखती हैं, इसका कारण यहां की हर वस्तु का कलात्मक होना है। जयपुर की रजाईयां वजन में बहुत हल्की और रेशमी छुअन का एहसास करती हैं। इसी के साथ सस्ती और जयपुर की कल्चर में रंगी प्रिंट के कारण दुनियाभर में ये रजाईयां बहुत मशहूर हो चुकी हैं।

खासियत-

जयपुर की रजाईयों की तीन खासियत सबसे मशहूर हैं, लाइट वेट, लोकल प्रिंट और सिल्की टच। जयपुर की सौ ग्राम रूई से बनी रजाईयां दुनियाभर में फेमस हैं। हल्की होने के कारण इन्हें कोरियर कर के विदेश में भेजना आसान होता है। आजकल ऑनलाईन इनकी बिक्री दुनिया के हर कोने में होती है। जयपुर आने वाले विदेशी पर्यटक भी इन्हें खरीदने को प्राथमिकता देते हैं। इसकी खासियतों में इन रजाइयों के कवर पूरी तरह राजस्थानी संस्कृति के रंगों में रंगे होना भी है। विशेषत: बगरू प्रिंट की रजाइयों की मांग बहुत होती है। प्रिंट के साथ कलर भी बहुत आकर्षक होते हैं। डार्क रंगों के लोकल प्रिंट देश और दुनिया में भारी डिमांड रखते हैं। इन रजाईयों का सिल्की टच अपने आप में सुखद एहसास है। ऐसा नहीं कि वजन में हल्की होने से ये रजाइयां गर्म नहीं होती वरन अपने सिल्की गर्म एहसास को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता, आप स्वयं जब इन हल्की गर्म रजाईयों में होंगे तब यह एहसास समझ पाएंगे।

इतिहास-

दरअसल ये रजाईयां राजा महाराजाओं और उनके परिवार के लिए सिद्धहस्त मुस्लिम कारीगर बनाया करते थे। जयपुर स्थापना के समय राजमहल के आसपास हाथ के कारीगरों को बसाया गया था, इनमें रजाई-गद्दे-मसनदें और सर्दी की पोशाकें तैयार करने वाले कारीगर भी बसाए गए। इन कारीगरों का सारा कामकाज राजपरिवार और रईसों पर निर्भर था। तंत्र बदला लेकिन शौक वही रहा। राजपरिवार के साथ साथ ये रजाईयां नेताओं को भी खूब रास आई। आज भी राजपरिवार के लोग जयपुरी रजाईयां इस्तेमाल करते हैं, जयपुर के रईस लोग भी इन रजाईयों को रखना अपनी शान समझते हैं, आर्थिक बदलाव आने से ये रजाईयां मध्यम वर्ग की सीमा तक भी आ गई हैं।

जयपुरी रजाई का निर्माण-

जयपुर के शाही महल के आसपास सिरहड्योढी बाजार में इन रजाइयों की पुरानी दुकानें बहुतायत से मिल जाती हैं। पुराने शहर में हवामहल रोड, रामचंद्रजी की चौकड़ी, चांदी की टकसाल, सुभाष चौक, बड़ी चौपड़, रामगंज, त्रिपोलिया, छोटी चौपड़, गणगौरी बाजार आदि कई जगह इन रजाईयों की पुरानी दुकानें और कारीगर मिल जाते हैं। खास बात यह कि इन रजाईयों का निर्माण आज भी हाथ से किया जाता है। हाथ से बनी रजाई ही जयपुर की ऑरिजनल जयपुरी रजाई है। इसमें रूई को कारीगर द्वारा पतली बेंत से इतना पेंदा जाता है कि सौ ग्राम रूई पूरे छह फीट के खोल में समाने जितने स्पेस में बिछ सके। इस कार्य में घंटों लग जाते हैं। रजाई के खोले भी स्पेशल होते हैं। इनका ऊपर का हिस्सा रेश्मी और कलात्मक होता है जबकि अंदर का ओढे जाने वाला हिस्सा सूती होता है। खोल को जमीन पर उल्टा बिछाकर उसपर पेंदी हुई रूई रखी जाती है और इस तरह से रोल किया जाता है कि खोल सीधा हो जाता है और सारी रूई खोल के अंदर समा जाता है। इसके बाद रजाई में रूई को बाराबर एडजस्ट करने के लिए बेंत से पेंदा जाता है और फिर धागे डाल दिए जाते हैं। आजकल आकर्षक और सुविधाजनक पैकिंग ने इन रजाईयों को यहां से वहा लाने ले जाने में आसानी कर दी है, जिससे व्यापार बढा है।

रजाईयों के रूप-

जयपुरी रजाईयों कई रूपों और विशेषताओं के साथ बाजार में उपलब्ध हैं। इनमें हैंड ब्लॉक बगरू प्रिंटिड, वेलवेट रजाई, कॉटन स्टफ्ड रजाई, मल्टीकलर डुएट रजाई, जयपुरी लहरिया रजाई, ट्रेडिशनल सांगानेरी प्रिंटेड रजाई, जाल प्रिंट रजाई, कॉटल डुएट प्रिंटिड, सांगानेरी गोल्ड प्रिंटिड रजाईयां बहुत पसंद की जाती हैं। आजकल जयपुरी रजाईयों को मॉडर्न प्रिंट के साथ भी पसंद किया जा रहा हैं। ये रजाईयां सिंगल और डुएट साइजों में उपलब्ध हैं और दोनों की रेट में बहुत ज्यादा फर्क भी नहीं होता। ऑरिजनल जयपुरी रजाईयां 1050 से लेकर 3000 रूपए तक मिल जाती हैं।