मनिहारों का रास्ता – जयपुर

जयपुर की लाख की चूड़ियां देश विदेश में बहुत प्रसिद्ध  हैं। देश भर के पर्यटक यहां की लाख से बनी चूड़ियों को बहुत पसंद करते हैं और शहर में शॉपिंग करते वक्त लाख की इन चूड़ियों को खरीदना नहीं भूलते।

जयपुर की स्थापना के साथ साथ इस शहर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह ने शहर की समृद्धि के लिए मुख्य रास्तों पर बाजार विकसित किया। साथ ही बाजारों से लगते मोहल्लों में फनकारों, हुनरकारों और हाथ का काम करने वाले कुशल कारीगरों को बसाया। यही कारण है कि आज परकोटा क्षेत्र में कई मुहल्ले ऐसे है जो आज तक अपने काम की वजह से जाने पहचाने जाते हैं। जैसे- ठठेरों का रास्ता, घीवालों का रास्ता, जौहरी बाजार, हल्दीयों का रास्ता, पन्नीगरों का मोहल्ला और मणिहारों का रास्ता।
हम आपको मनिहारों के रास्ते में बताएंगे और यह भी जानकारी देंगे कि मनिहारों के रास्ते में लाख की चूड़ियां किस प्रकार बनाई जाती हैं।

मणिहारों का रास्ता

जयपुर में एक समय लाख की मणियां बनाकर उनके हार बनाने वाले कारीगरों की बड़ी संख्या मौजूद थी। ये लोग मणिहार कहलाते थे। उस समय के शासकों ने इन लोगों को त्रिपोलिया बाजार और मणिहारों की गली के आसपास बसाया। धीरे धीरे लोगों की रूचि और समय की मांग के अनुसार ये लोग लाख की चूड़ियां बनाने लगे। आज जयपुर में लगभग छह हजार परिवार लाख की चूड़ियां और अन्य सामान बनाने के कार्य में जुटे हैं।

चूड़ों के नाम

लाख की चूड़ियों को यहां कई नामों से पुकारा जाता है। इनके नाम हैं- अनारकली, पन्नी कड़ा, केरी कड़ा, माशे का कड़ा, पंच बंदया चूड़ा, मेथी का चूड़ा, लहरिया चूड़ा आदि। जयपुर की युवतियों और महिलाओं में अनारकली चूड़ा सबसे लोकप्रिय है।

बनाने में लगती है मेहनत

लाख की चूड़ियां बनाने में ये परिवार बहुत मेहनत करते हैं। लाख की चूड़ियां बनाने में चपड़ी, चौक, बिरोजा, रंग तथा नगीने काम में लिये जाते हैं। पहले चपड़ी को साफ करके उनमें से शुद्ध लाख निकाला जाता है। इसके बाद उसे गर्म करके उसमें सूखा बिरोजा, सोप स्टोन पाउडर और रंग मिलाकर लकड़ी  के बेलन पर तैयार किया जाता है। इसके बाद इसे गढने वाले शिल्पी इन्हें इच्छानुसार सांचों में ढालकर चूडे और चूडियां बनाते हैं। इसके बाद एक निश्चित तापमान पर इन्हें गर्म कर नगीने चिपकाने का काम किया जाता है।

जयपुर की स्थापना  को ढाई सौ साल बीत गए हैं। ऐसे में बाजार कई फैशनों के दौर से गुजरा। लेकिन लाख के चूड़ों का प्रचलन आज भी है। यों कहें कि लाख के चूड़ों का फैशन बढ़ा है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। वास्तव में मणिहारों के रास्ते का इतिहास जितना लंबा है, उसका भविष्य उतना ही उजला है।

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