स्वर्णगिरि दुर्ग : जालोर

स्वर्णगिरि दुर्ग : जालोर (Swarngiri Fort : Jalor)

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जालोर में सोनगिरि की पहाड़ियों पर स्थित स्वर्णगिरि दुर्ग का विहंगम दृश्य

राजस्थान का इतिहास गौरवगाथाओं से भरा हुआ है। राजस्थान का दक्षिणी-पश्चिमी जिला  जालोर ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। जालोर का दुर्ग मारवाड़ का सबसे मजबूत गढ़ रहा है। इस दुर्ग का निर्माण परमारों ने कराया था। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि यह दुर्ग परमारों के बाद चौहानों और राठौड़ों के कब्जे में रहा। वर्तमान में जीर्ण-शीर्ण हो चुका यह दुर्ग अपनी प्राचीनता, मजबूती ओर सोनगरा चौहानों के शौर्य के लिए देशभर में विख्यात रहा है।

सोनगिरि, स्वर्णगिरि और सोनलगढ़

जालोर जिले के दक्षिण-पूर्व में मध्यम ऊंचाई की पर्वत श्रेणियों का फैलाव है। इस क्षेत्र में कुछ सदियों पूर्व घने जंगल थे। जालोर के पूर्वी छोर पर फैली अरावली पर्वतमाला की एक  2408 फीट ऊंची पहाड़ी सोनगिरि कहलाती है। यह जालोर के मध्यम में स्थित है। सोनगिरि पर्वत पर ही यह विशाल दुर्ग स्थित है। इसी पर्वत के कारण इस इस दुर्ग को स्वर्णगिरि दुर्ग के नाम से जाना जाता है। शिलालेखों में जालौर को जाबालीपुर और इस दुर्ग को सुवर्णगिरि के नाम से उल्लेखित किया गया है। स्वर्णगिरि से अपभ्रंष होकर इसका नाम सोनलगढ़ पड़ा और सोनलगढ़ पर कब्जा करने के कारण चौहान राजपूत सोनगरा कहलाने लगे।

जालोर के दुर्ग का निर्माण वास्तुकला के नजरिये से ठेठ हिन्दू शैली से हुआ है। लेकिन दुर्ग के प्रांगण में मुस्लिम संत मलिक शाह की पुरानी मस्जिद भी है। दुर्ग में जलस्रोतों की भी कोई कमी नहीं है। इसके अलावा सैनिकों के आवास भी बड़ी संख्या में बने हुए हैं। दुर्ग की मजबूती का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसकी बाहरी दीवार पर युद्धों में असंख्य प्रहारों के निशान हैं लेकिन भीतरी भाग को जरा भी हानि नहीं पहुंची है। दुर्ग में यहां वहां बिखरी पड़ी तोपें जालोर के संघर्षमय इतिहास की ओर इंगित करती हैं।

जालोर दुर्ग का इतिहास

jal-kirtiजालोर दुर्ग का निर्माण दसवीं सदी में परमार शासकों ने कराया था। इस सदी में परमारों की शक्ति चरम पर थी। जालोर से प्राप्त शिलालेखों के आधार पर इतिहासकारों का मानना है कि दुर्ग का निर्माण राजा धारावर्ष परमार ने कराया। बारहवीं सदी तक जालोर दुर्ग पर परमारों का राज रहा, इसके बाद गुजरात के सोलंकियों ने परमारों को कुचल दिया। हारे हुए परमारों में सिद्धराज जयसिंह का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। सिद्धराज की मौत के बाद किर्कित्तपाल चौहान ने दुर्ग को घेर लिया। कई माह के संघर्ष के बाद किर्कित्तपाल ने दुर्ग पर कब्जा कर ही लिया। किर्कित्तपाल के बाद समर सिंह और उसके बाद 1205 से 1241 तक उदयसिंह ने राज किया। 1211 से 1216 के दरमियान गुलाम वंश के शासक इल्तुतमिश ने दुर्ग पर घेरा डाला। उदयसिंह ने डटकर सामना किया लेकिन आखिर उसे हथियार डालने पड़े। कान्हड़देव जब यहां के राजा थे तब 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने यहां आक्रमण किया। कहा जाता है कि खिलजी ने सेना अपनी दासी गुले बहिश्त के नेतृत्व में सेना भेजी थी जिसे कान्हणदेव ने हरा दिया। इससे चिढकर खिलजी ने एक भारी सेना कमालुद्दीन के नेतृत्व में भेजी लेकिन यह सेना भी दुर्ग पर अधिकार नहीं कर सकी। खिलजी ने इस दुर्ग पर कब्जा करने के ठान ली थी और उसने दुर्ग के चारों ओर सेना का डेरा डाल दिया। तब प्रलोभन में आए एक राजपूत ने ही मुगल सेना का गुप्त मार्ग बता दिया और सेना दुर्ग में घुस गई। इस युद्ध में कान्हड़देव शहीद हुए। उनके शहीद होने के बाद कान्हड़देव के पुत्र वीरमदेव ने मोर्चा संभाला और शत्रुओं से डटकर युद्ध किया। लेकिन दुर्ग में रसद की कमी हो जाने के कारण वे ज्यादा दिन खिलजी सेना को नहीं रोक सकते थे, इसलिए वीरम ने पेट में कटार भोंककर आत्मघात कर लिया। चौदहवीं-पंद्रहवीं सदी में जालोर मुस्लिम शासकों के कब्जे में रहा। 1559 में इस पर मारवाड़ के मालदेव राठौड ने हमलाकर अपना कब्जा जमा लिया लेकिन 1617 में मारवाड़ के ही शासक गजसिंह ने इसपर अपना अधिकार कर लिया। अठारहवीं उन्नीसवीं सदी में जालोर दुर्ग मारवाड़ राज्य का ही एक हिस्सा था।

पर्यटन और पुरातत्व

jal diwarजालोर जिले में पर्यटन और पुरातत्व के नजरिये से विकास की भरपूर संभावनाएं हैं। यहां की संस्कृति में भी पुरातन प्रेम झलकता है। जालोर का इतिहास उथल-पुथल भरा रहा है। जालोर की आन बान का प्रतीक यह दुर्ग आज भी जालोर के शासकों की शौर्य गाथाएं गा रहा है। 1956 में यह दुर्ग संरक्षित स्मारक की श्रेणी में रखा गया। टेढ़े मेढ़े बसे जालोर शहर की आड़ी तिरछी गलियों से होकर एक रास्ता स्वर्णगिरि की ओर जाता है। जहां यह शानदार दुर्ग स्थित है। दुर्ग का पहला द्वार सूरजपोल है। यह विशाल धनुषाकार दरवाजा बहुत खूबसूरत है जिसके ऊपर द्वारपालों की कोठरियां आज भी बनी हुई हैं। दरवाजे के ठीक सामने एक 15 फीट मोटी व 25 फीट ऊंची दीवार बनी हुई है। यह दीवार तोपों के सीधे प्रहार से मुख्य महल को बचाने के लिए बनाई गई थी। दरवाजा टूट जाने की दशा में यही दीवार तोपों के गोलों को झेलती थी, गोलों के निशान आज भी इस दीवार पर बने हुए हैं। यहां से लगभग एक किमी की दूरी पर दुर्ग का दूसरा दरवाजा ध्रुवपोल स्थित है। यहां मुख्य दुर्ग की रक्षा के लिए सघन नाकेबंदी की जाती थी। सामरिक दृष्टि से यह दरवाजा विशेष महत्व रखता था। तीसरा दरवाजा चांदपोल है। यह अन्य दो दरवाजों से ज्यादा मजबूत, भव्य और सुंदर है। इस दरवाजे से प्राचीरें दोनो दिशाओं में फैलकर मुख्य महल को गोलाकार में घेर लेती हैं। ध्रुवपोल और चांदपोल के बीच दुर्ग की सुरक्षा के खास इंतजाम किये जाते थे, यह स्थल बड़ा सुरक्षित माना जाता था, प्राचीरों और दरवाजों की रचना चक्रव्यूह की भांति की गई है। चौथा द्वार सिरेपोल है। इस द्वार से एक दीवार पहाड़ी की शीर्ष की ओर तो दूसरी दीवार पहल के पीछे से होती हुई पहली दीवार से आ मिलती है। लंबाई चौड़ाई के नजरिये से यह दुर्ग बहुत छोटा है।

दुर्ग के आकर्षण

jal-darwazaस्वर्णगिरि दुर्ग में राजा मानसिंह का महल, दो बावड़ियां, एक शिव मंदिर, देवी  योगमाया का मंदिर, वीरमदेवी की चौकी, तीन जैन मंदिर, मिल्लकशाह की दरगाह और मस्जिद स्थित है। पार्श्वनाथ का जैन मंदिर बहुत भव्य और कलात्मक है। मंदिर में मूर्ति-शिल्प देखने लायक है। पत्थर पर उत्कीर्णकला उल्लेखनीय है। यहां चौमुखा जैन मंदिर के पास ही एक छोटा लेकिन कलात्मक कीर्ति स्तंभ भी है। यह आदमकद स्तंभ एक बावड़ी में मिला था, जिसे यहां एक चबूतरे पर स्थापित कर दिया गया है। इतिहासकारों का मानना है कि यह स्तंभ परमार शासकों के युग का है। परमार शासकों की यही आखिरी निशानी इस दुर्ग में शेष है। स्तंभ पर लाल पत्थर पर बारीक गढाई बहुत ही आकर्षक है। मानसिंह महल में विशाल सभा मंडप है। इसी के पास एक हॉल बना हुआ है। हॉल में कुछ छोटी तोपें और एक विशाल तोप रखी है। मानसिंह के महल से आम रास्ते की ओर खूबसूरत झरोखे बने हुए हैं। इसी महल के एक भाग में दो मंजिला रानी का महल भी बना हुआ है। रानीमहल में भूमिगत बावड़ी है जो दर्शकों के लिए बंद कर दी गई है। मानसिंह महल में ही एक ओर कोठार और भंडारण स्थल बने हुए हैं। इनमें अन्न और खाद्यान्न का भंडारण किया जाता था। महल के पीछे शिव मंदिर बना हुआ है। यहां सफेद शिवलिंग बना हुआ है जो दुर्लभ है। इसी मंदिर के पास बावड़ी और चामुंडा देवी का मंदिर भी बना हुआ है। मंदिर में एक शिलालेख पर युद्ध से घिरे कान्हड़देव के पास मां चामुंडा की कृपा से चमत्कारिक रूप से तलवार पहुंचने का वर्णन है। दुर्ग के सर्वोच्च स्थल पर वीरमदेव की चौकी बनी हुई है। यहां से जालोर का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। इस स्थल पर जालोर रियासत का ध्वज लगाया जाता था। चौकी के पास एक मस्जिद बनी हुई है।

यह दुर्ग अपने इतिहास में कारागृह होने का अध्याय भी जोड़ चुका है। इस किले में स्वतंत्रता आंदोलन के समय अंग्रेजों ने स्वतंत्रता सेनानी गणेशलाल व्यास, मथुरादास माथुर, फतेहराज जोशी और तुलसीदास राठी जैसे नेताओं को नजरबंद कर दिया गया था।