कला को प्रश्रय देता शहर : जयपुर

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कला को प्रश्रय देता शहर : जयपुर (Art entertains City: Jaipur)

जयपुर शहर का इतिहास गवाह है कि इस शहर ने कला के साधकों को हमेशा आश्रय दिया, सम्मान दिया। कलाकारों को इतना आदर सम्मान देने के कारण ही आज यह शहर पूरी दुनिया में सबसे बड़ी कलात्मक नगरी कहलाती है। जयपुर के चप्पे चप्पे पर कला बिखरी हुई है। चाहे वह कला शिल्प की हो या संगीत की। जयपुर ’कला को प्रश्रय देता शहर’ है, इसमें कोई दोराय नहीं।

जयपुर की कला : इतिहास

हिन्दुस्तान के इतिहास में औरंगजेब ऐसा शासक हुआ जिसकी धर्मांधता ने हिन्दू समाज को तोड़ कर रख दिया। उसने बड़ी संख्या में मूर्तियां और मंदिर तुड़वाए। इससे पत्थर तराशने वाले कारीगरों में भय व्याप्त हो गया। उन्होंने अपना कारोबार बंद कर दिया। वे दर दर भटकने लगे। ऐसे में जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह ने देशभर के मूर्तिकारों से जयपुर आकर बसने का आव्हान किया। तब गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार के अलावा कोटा, बूंदी और अलवर तक के शिल्पकार यहां आकर बस गए। यही कारण है कि जयपुर के सभी स्मारक आज दुनिया में अपने शिल्प और सौंदर्य के कारण जाने जाते हैं।

जयसिंह ने सिर्फ मूर्तिकारों को ही नहीं, बल्कि लेखकों, गायकों, नर्तकों, कवियों, ज्योतिषियों, चित्रकारों को भी प्रश्रय, पैसा और पूरा सम्मान दिया। इन्हीं कलाकारों और इनकी पीढ़ियों ने कालान्तर में जयपुर में हर कला को एक ऊंचे आयाम तक पहुंचा दिया। शिक्षा, संगीत, लेखन, वास्तु और ज्योतिष आदि सभी क्षेत्रों में जयपुर ने नाम कमाया और सांस्कृतिक शहर कहलाया।

खजानेवालों का रास्ता : मूर्तिकला का आगार

जयपुर में चांदपोल बाजार में मूर्ति कलाकारों का मोहल्ला बसा है। जयपुर की स्थापना के समय यहां राजदरबार में कोष अर्थात खजाना विभाग में काम करनेवाले मुनीमों को बसाया गया था। इसलिए इस रास्ते की पहचान खजानेवालों का रास्ता पड़ा। लेकिन देश भर से आए मूर्तिकारों को जब यहां बसाया गया और उन्होंने अपने उद्योग धंधे यहां स्थापित कर लिए तो इस इलाके को मूर्तिकारों के मोहल्ले के नाम से पहचान मिली। खजानेवालों के रास्ते में बड़े पैमाने पर संगमरमर की मूर्तियां बनाने का काम होता है। यह काम पीढ़ी दर पीढ़ी चल रहा है। अब ये कारीगर इतने कुशल हो गए हैं कि इनके बच्चे कच्ची उम्र में ही पत्थर तराशना सीख जाते हैं। मूर्तिकारों के इस मोहल्ले में अलवर से आए गौड़ीय ब्राह्मण मूर्तिकार और प्रजापति मूर्तिकारों को धाक है। मूर्तिकार अशोक गौड़ और अर्जुन प्रजापति ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जयपुर की मूर्तिकला को पहचान दिलाई है।

काला पत्थर, सफेद पत्थर

जयपुर में खजानेवालों के रास्ते के कलाकार मूर्तियां बनाने में काले और सफेद संगमरमर का इस्तेमाल करते हैं। काला संगमरमर कोटपूतली के पास भैंसलाना से मंगाया जाता है जबकि सफेद संगमरमर अजमेर के पास मकराना से आता है। मकराना का सफेद संगमरमर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है और इस पर मूर्तियां तराशने का काम भी आसानी से होता है, इसलिए यह सफेद पत्थर प्रचलन में ज्यादा है, जबकि काले पत्थर की उपलब्धता भी कम है और इस पर कार्य करना भी कठिन है, इसलिए काले पत्थर का शिल्प यहां कम देखने को मिलता है और सफेद की तुलना में यह महंगा भी है। काले संगमरमर से ज्यादातर महापुरूषों की मूर्तियां बनाई जाती हैं।

मूर्तिशिल्प का निर्माण

पत्थर को मूर्ति की शक्ल देना कई चरणों से होकर गुजरता है। सबसे पहले मूर्ति का आकार निश्चित किया जाता है और उससे थोड़ा बड़ा पत्थर प्रयोग किया जाता है। अब पत्थर पर मूर्ति का खाचा खींचा जाता है और रफ कटिंग कर ली जाती है। इसके बाद छैनी और हथौड़ी से मूर्ति को आकार दिया जाता है। यह एक लंबी प्रक्रिया होती है और इसमें पर्याप्त सावधानी बरती जाती है। इसके बाद मूर्ति को तराशा जाता है। मूर्ति के बारीक अंग तराश में ही उभरकर सामने आते हैं। आखिर में मूर्ति को चमकदार और सुंदर बनाने के लिए पॉलिशिंग और फिनीशिंग की जाती है। कई मूर्तियां में रंग भी भरे जाते हैं।

जयपुर की मूर्तिकला देश  ही नहीं बल्कि विदेशों तक प्रसिद्ध है। खजाने वालों के रास्ते के अलावा भी शहर के आसपास के इलाकों में मूर्तिकला का काम बहुत बड़े पैमाने पर होता है। विदेशों में भी जयपुरी मूर्तियों की भारी मांग हैं। जबकि स्थानीय बाजार में संगमरमर के छोटे आर्ट की भी बहुत ज्यादा मांग हमेशा रही है।

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