जयपुर के महाराजा और निर्माण

जयपुर के महाराजा और निर्माण (Jaipur Kings and construction)

जयपुर दुनिया के सबसे खूबसूरत शहरों में से एक है। कछवाहा वंश के राजपूत शासकों ने इन सुंदर शहर का निर्माण कराया। महाराजा सवाई जयसिंह ने शुरूआत की और सवाई रामसिंह, सवाई प्रताप सिंह, ईश्वरी सिंह, महाराजा माधोसिंह और मानसिंह तक ने इस शहर को खूबसूरत बनाने के प्रयास किए। आईये जानतें हैं कब कब जयपुर की खूबसूतर कहानी में लिखी गई एक एक इबारत।

महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय

महाराज सवाई जयसिंह ने 1727 में जयपुर की नींव रखी। चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरे आमेर में राज्य विस्तार मुश्किल था। जनसंख्या बढ़ रही थी और पेयजल के स्रोत भी कम थे। उधर दिल्ली में मुगलों का शासन कमजोर पड़ रहा था। ऐसे में जयसिंह ने अपने राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिए राजधानी को स्थानांतरित करने पर विचार किया। चूंकि धन के अथाह भंडार उपलब्ध थे इसलिए वास्तु और भारतीय शिल्पशास्त्र के आधार पर एक ऐसा नगर बसाने की योजना बनाई गई जो सुरक्षित, समृद्ध, सभी सुविधाओं से लैस और खूबसूरत हो। शिल्पशास्त्र और वास्तु के ज्ञाता विद्याधर को यह जिम्मेदारी दी गई और जयपुर का निर्माण आरंभ हो गया। जयपुर परकोटा की ज्यादातर इमारतों का निर्माण जयसिंह द्वितीय ने ही कराया। इनमें मुख्य महल सिटी पैलेस, गोविंददेवजी मंदिर और जंतर मंतर प्रमुख है। जंतर मंतर अब विश्व विरासत में शामिल है।
नाहरगढ़ का निर्माण 1734 में कराया था। एक मजबूत और लम्बी प्राचीर के साथ इसे जयगढ़ के साथ जोड़ा गया। साथ ही नाहरगढ़ तक पहुंचने के लिए मार्ग भी विकसित किया गया। इतिहास में समय-समय पर नाहरगढ़ ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं।
जयसिंह ने अपने मुख्य महल के सामने सूरजनिवास उद्यान में भगवान कृष्ण का बिना शिखर का मंदिर बनवाया। यह मंदिर इस तरह से बनाया गया था कि महाराजा को अपने बिस्तर से उठते ही भगवान कृष्ण के दर्शन होते थे। गोविंदजी की मूर्ति पहले वृंदावन के मंदिर में स्थापित थी जिसको सवाई जयसिंह द्वितीय ने पहले कनक वृंदावन में स्थापित कराया और फिर सिटी पैलेस के उद्यान में।
कनक वृंदावन बाग और मंदिर का निर्माण भी महाराजा सवाई जयसिंह ने कराया था। उन्होंने यह उद्यान वृंदावन से जयपुर पहुंची गोविंददेवजी की प्रतिमा को स्थापित करने के लिए बनवाया था। चूंकि यह मूर्ति वृंदावन के उपवन क्षेत्र से यहां लाई गई थी इसलिए इस वनक्षेत्र को बाग के तौर पर तैयार कर इसे कनक वृंदावन नाम दिया गया।
महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने अपनी प्रिय सिसोदिया रानी के लिए सन 1728 में सिसोदिया गार्डन निर्मित कराया था। सिसोदिया रानी उदयपुर के राजघराने की बेटी थी जिनका विवाह जयपुर के महाराजा जयसिंह से हुआ था। प्राकृतिक वातावरण में पली बढ़ी रानी को शहर की भीड़भाड़ से दूर सुरम्य प्राकृतिक वातावरण देने के लिए यह सुंदर गार्डन बनवाया।

महाराजा ईश्वरी सिंह

ईश्वरी सिंह जयपुर के युवा महाराजा थे। मराठा शासक प्राय: जयपुर पर हमले की बाट में रहते थे। 1744 में मराठों ने जोधपुर और बूंदी के राजाओं और दो अन्य रियासतों के साथ मिलकर जयपुर पर हमला कर दिया। ईश्वरी सिंह ने सेनापति हरगोविंद नाटाणी को पांच सेनाओं के इस भीषण मुकाबले का सामना करने भेजा। नाटाणी ने बगरू के मैदान में शत्रु सेना को धूल चटा दी। इस जीत की खुशी में 1749 में महाराजा ईश्वरी सिंह ने पांच खंडों की इमारत ईसरलाट का निर्माण कराया। ईसरलाट त्रिपोलिया बाजार के पश्चिमी किनारे पर ऊंची मीनारनुमा इमारत है।

महाराजा सवाई माधोसिंह 

चाहे फिर वो अपनों की सुरक्षा का जिम्मा हो या गैरों की रक्षा की चिंता। देशभर में 1857 की क्रांति की लहर थी। लोगों का खून उबल रहा था। जगह-जगह गोरों और उनके परिवार पर हमले हो रहे थे। तात्कालीन महाराजा सवाई रामसिंह को अपनी रियासत में रह रहे यूरोपीय लोगों, ब्रिटिश रेजीडेंट्स और उनके परिवारों की सुरक्षा का खयाल था। उन्होंने इलाके के सभी गोरों और उनके परिवारवालों को सकुशल नाहरगढ़ भिजवा दिया और अपने अतिथि धर्म का पालन किया। संपूर्ण रूप से देखा जाए तो नाहरगढ़ का निर्माण एक साथ न होकर कई चरणों में हुआ। महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने इसकी नींव रखी, प्राचीर व रास्ता बनवाया, इसके बाद सवाई रामसिंह ने यहां 1868 में कई निर्माण कार्य  कराए। बाद में सवाई माधोसिंह ने 1883 से 1892 के बीच यहां लगभग साढ़े तीन लाख रूपय खर्च कर महत्वपूर्ण निर्माण कराए और नाहरगढ़ को वर्तमान रूप दिया। महाराजा माधोसिंह ने ही सिटी पैलेस का मुबारक महल भी बनवाया था और महाराजा रामसिंह के बाद अल्बर्ट हॉल का निर्माण कार्य पूरा कराया था।

महाराजा सवाई प्रतापसिंह

जयपुर का सिंबल बन चुके हवामहल को निर्माण सवाई प्रतापसिंह ने कराया। महाराजा सवाई प्रतापसिंह कृष्णभक्त थे। इसके साथ ही वे महिलाओं के प्रति भी उदार थे। जयपुर में शाही सवारियां राजमहल से त्रिपोलिया होती हुई बड़ी चौपड़ से सिरहड्योढ़ी की ओर जाया करती थी। हवामहल उस वक्त महारानियों का महल हुआ करता था और आज जिसे हवामहल कहा जाता है वह दीवार सपाट थी। सवाई प्रताप सिंह ने 1799 में राजमहल की महारानियों, रानियों और अन्य महिलाओं के लिए यहां 952 खिड़कियों वाला खूबसूरत झरोखा बनाया। यह पांच मंजिला झरोखा ही बाद में हवामहल कहलाया। कृष्णभक्त होने के कारण प्रतापसिंह ने इसे मुकुट के आकार का बनवाया।

महाराजा रामसिंह द्वितीय

महाराजा रामसिंह द्वितीय ने जयपुर को खूबसूरत बनाने में बेहतरीन प्रयास किये। उन्होंने जयपुर परकोटा से दक्षिण की ओर विशाल उद्यान रामनिवास बाग बनवाया। 1865  में बने इस उद्यान में चिड़ियाघर, पौधघर, वनस्पति संग्रहालय भी बनवाया गया। यहां विभिन्न खेलों के लिए क्रिकेट और फुटबॉल के मैदान भी बनाए गए। खास बात यह है कि इस उद्यान का निर्माण  बाढ राहत परियोजना के अंतर्गत किया गया था। वर्तमान में यहां अल्बर्ट हॉल, रवीन्द्र मंच और रामनिवास पार्किंग स्थल भी है। शहर का म्यूजियम अल्बर्ट हॉल भी महाराजा सवाई रामसिंह और उनके बाद सवाई माधोसिंह ने तैयार कराया। इस मयूजियम में ऐतिहासिक वस्तुओं के साथ साथ इजिप्टियन ममी तूतू का संग्रह विशेष आकर्षण है। अल्बर्ट हॉल प्रिंस ऑफ वेल्स अल्बर्ट एडवर्ड को समर्पित इमारत है। इसकी डिजाईन अंग्रेज वास्तुविज्ञ जैकब ने तैयार की थी। जयपुर को गुलाबी रंग देने का श्रेय भी महाराजा रामसिंह को जाता है।

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