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दक्षिण एशिया के सबसे छोटे बच्चे को पेट की जटिल सर्जरी कर बचाया

जीवन्ता हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने फिर एक बार रचा इतिहास

वजन था मात्र 520 ग्राम………

* पैदा होते ही हुआ पेट का जटिल ऑपरेशन ……..

जीवन्ता चिल्ड्रन हॉस्पिटल ने बचाया 12 दिन के 520 ग्राम के नवजात शिशु को,

पुरे दक्षिण एशिया में ऐसा पहला मामला जिसमे चिकित्सकों को मिली जीत

उदयपुर के जीवन्ता चिल्ड्रन हॉस्पिटल के चिकित्सकों ने पुरे दक्षिण एशिया के सबसे छोटे , 12 दिन के 520 ग्राम वजनी नवजात के पेट की सफल सर्जरी कर उसे जीवनदान देने का इतिहास रच दिया है.

पैदा होते ही नवजात के पेट का दर्द नासूर बन गया. बरसों सुनी गोद की पीड़ा झेलने के बाद वो माँ बनी भी तो खुशियां छिटक कर दूर जाती दिखी .सौभाग्य मिला भी तो मजाक सा लगने लगा .

आखिर नसीब में शायद यही लिखा था , लेकिन उम्मीद आखिर कोण छोड़ता है. भगवान ने आखिर यह गुहार सुन ही ली . जीवन्ता हॉस्पिटल के चिकित्सकों ने उस नन्हे के पेट के जख्म को दूर कर दिया .

क्या था मामला –

मगरौनी मध्य प्रदेश निवासी उमेश मदनलाल आर्य दम्पति को शादी के 29 वर्षों बाद माँ बनने का सौभाग्य मिला, किन्तु 26 सप्ताह के गर्भावस्था में माँ का ब्लड प्रेशर/ रक्तचाप बेकाबू हो गया था और सोनोग्राफी से पता चला की भ्रूण को रक्त का प्रवाह बंद हो गया है और भ्रूण का विकास नहीं हो रहा है , तभी आपातकालीन सीजेरियन ऑपरेशन से शिशु का जन्म 13 फरवरी को कराया गया. शिशु को जन्म के तुरंत बाद जीवन्ता हॉस्पिटल के नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई में शिफ्ट करके नवजात शिशु विशेषज्ञ डॉ सुनील जांगिड़, डॉ निखिलेश नैन , डॉ कपिल श्रीमाली एवं उनकी टीम के द्वारा शिशु की देखभाल की गयी . शिशु को सांस लेने में खाफी कठिनाई हो रही थी, उसे तुरंत वेंटीलेटर पर लिया गया

क्यों करनी पड़ी इस मासूम की सर्जरी

डॉ सुनील जांगिड़ ने बताया की शिशु का जन्म के बाद पेट फूलने लग गया था और दूध शुरू नहीं कर पा रहे थे. उम्र के बारवे दिन शिशु का पेट एकदम फूल गया, शरीर ठंडा एवं नीला पड़ने लगा . दिल की धड़कन व ब्लड प्रेशर भी कम होने लगा . जांच में पता चला की उसकी आंतें फूल गयी है , जहर पुरे शरीर में फ़ैल गया है और खून में रक्तपेशिया भी कम हो गयी है . हमे लग गया था की हमारे पास अब ज्यादा वक्त नहीं है और दवाईओं से उपचार संभव नहीं है . इस नाजुक स्थिति में ऑपरेशन ही एकमात्र विकल्प रह गया था . शिशु के परिजनों से शिशु के गंभीर बीमारी के बारे में विचार विमर्श किया . इतनी सी नाजुक जान का बड़ा ऑपरेशन करना बेहत खतरनाक था और ऑपरेशन के दौरान जान जाने का भी बड़ा खतरा था. परन्तु दम्पंति को किसी भी हालत में इस नन्ही सी जान को बचाना था क्योंकि यही उनकी आखरी उम्मीद थी. जीवन्ता हॉस्पिटल के शिशु सर्जन डॉ प्रवीण झँवर , एनेस्थेटिक डॉ सुरेश और समस्त ओटी स्टाफ ने जनरल अनेस्थेसिआ में शिशु के पेट का जटिल ऑपरेशन किया जो की लगभग डेढ़ घंटा चला.

डॉ प्रवीण झँवर ने बताया की ऑपरेशन के वक्त शिशु सिर्फ हथेली जितना ही था. ऑपरेशन के दौरान विशेष छोटे उपकरणों का इस्तमाल किया गया जिसमे कॉटरी [ विद्युत् प्रवाह ] मशीन जिसके द्वारा नाजुक पेट को खोला गया ताकि रक्तस्त्राव न हो. पेट की आंते काली पड़ने लग गयी थी . पूरे आँतों में मल / लेट्रिन पूरी तरह सुख कर जम गयी थी, आँतों में रुकावट का कारण बन गयी थी और आसानी से निकल नहीं रही थी , जिसे हम मेकोनियम इलियस सिंड्रोम कहते है . इसलिए आंत को बीच में से काट कर बड़ी मुश्किल से मल को निकाला गया . आँतों की स्थिति इतनी नाजुक और ख़राब थी की टाँके लगाते लगाते ही फट रहा था , मानो गीले पेपर की तरह बिखर रहा हो. बड़ी परेशानियों के बाद

टांके लगाए और पेट की अंदर से पूरी तरह सफाई की गयी . पेट की इतनी ख़राब स्थिति के बाद लग रहा था की शिशु का जीवित रहना मुश्किल ही नहीं बल्की नामुमकिन है .

इतने छोटे शिशु में ओपन सर्जरी क्यों होती है मुश्किल ?

डॉ सुनील जांगिड़ ने बताया की ऐसे कम वजनी व कम दिनों के पैदा हुए बच्चें का शारीरिक रूप से सर्वांगीण विकास पूरा नहीं हो पाता है। शिशु के फेफड़े, दिल, पेट की आंते , लीवर, किडनी, दिमाग, आँखें, त्वचा आदि सभी अवयव अपरिपक्व, कमजोर एवं नाजुक होते है. रोग प्रतिकारक क्षमता बहुत कम होती है जिससे संक्रमण का खतरा बहुत ज्यादा होता है और इलाज के दौरान काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे शिशु में ऑपरेशन तकनीकी रूप से बेहद मुश्किल , चुनौतीपूर्ण व जोखिमपूर्ण होता है

क्या हुआ ऑपरेशन के बाद ?

ऑपरेशन के बाद हमारी टीम को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा. हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी की टांको पर कोई तनाव ना पड़े, इसलिए नाक द्वारा पेट में नली डालकर उसे लगातार खाली रखा गया . इतने बड़े ऑपरेशन के बाद दूध देना संभव नहीं था, इस स्थिति में शिशु के पोषण के लिए उसे नसों के द्वारा सभी आवश्यक पोषक तत्व यानि ग्लूकोज, प्रोटीन्स एवं वसा दिए गए. शिशु के खून की कमी थी, खून में संक्रमण था, खून चढ़ाया गया, एंटीबायोटिक दिए गए. 15 दिनों बाद में धीरे धीरे नली के द्वारा बून्द बून्द करके दूध दिया गया। 35 दिनों बाद शिशु पूरा दूध पचने में सक्षम हुआ. 54 दिनों तक शिशु वेंटीलेटर पर रहा . शिशु को कोई संक्रमण न हो, इसका भी विशेष ध्यान रखा गया। 3 ½ महीने बाद बच्चा मुहं से दूध लेने लगा. चिकित्सकों की टीम द्वारा शिशु की दिनों तक आईसीयू में देखभाल की गयी।. शिशु के दिल, मस्तिष्क, आँखों का नियमित रूप से चेक अप किया गया।

आज 117 दिनों के जीवन व मौत के बीच चले लम्बे संघर्ष के बाद आखिरकार जीवन्ता चिल्ड्रन हॉस्पिटल के चिकित्सकों को सफलता हासिल की . अब उसका वजन 2100 ग्राम हो गया है। वह पूरी तरह स्वस्थ है

शिशु की माँ उमेश ने कहा – हम बहुत निराश हो चुके थे , एक तो बच्ची का वजन मात्र 520 ग्राम था और ऊपर से इतनी बड़ी सर्जरी , किन्तु हमे डॉ सुनील जांगिड़ की टीम जीवन्ता पर पूरा भरोसा था, जो पहले भी 400 ग्राम वजनी प्रीमयचुअर शिशु को जीवनदान दे चुके है. हम जीवन्ता हॉस्पिटल के आभारी है. आज बच्ची को गोद में लेकर बहुत ख़ुशी हो रही है और इसका बचना कोई चमत्कार से कम नहीं है . हमने इसका नाम जानवी रखा है.

क्या कहते है एक्सपर्ट –

डॉ प्रदीप सूर्यवंशी [ प्रोफेसर व हेड निओनेटोलॉजी, पुणे ] ने बताया की लिटरेचर का अध्ययन करने पे पता चला की जानवी पुरे भारत ही नहीं बल्कि पुरे दक्षिण एशिया में अभी तक की सबसे कम वजनी शिशु है जो पेट की जटिल सर्जरी के बाद जिन्दा बची है व स्वस्थ है . पुरे दुनिया ऐसे पेट की जटिल सर्जरी के बाद अभी तक सिर्फ 4 से 5 नवजात ,जो की 500 ग्राम वजन से कम है उनको बचाया जा चूका है और जानवी उनमे से एक है.. इस केस में शिशु के बचने की संभावना 10 % से भी कम थी और इतने बड़े ऑपरेशन के बाद शिशु का जीवित रहना और सामान्य रहना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है .

डॉ सुनील जांगिड़
डायरेक्टर- जीवन्ता चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल , उदयपुर
M- 9460891442
Mail- jangidsunil1@gmail.com

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