रवीन्द्र मंच (Ravindra Manch)

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ravindra manch

रवीन्द्र मंच
Ravindra Manch

कलाओं की नगरी जयपुर देश और दुनिया में अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखती है। इसी पहचान की बदौलत इस गुलाबी नगर में विश्वभर से पर्यटक आते हैं और इसके मोहपाश में बंधकर इसी के रंग में रंग जाते हैं। रंगों के ऐसे ही अनूठे सम्मिश्रण से बनी यह यह नगरी, जिसे कभी रत्न सिटी कहा जाता है, कभी छोटी काशी, कभी कल्चरल सिटी और कभी पूर्व का पेरिस। गुलाबी रंग तो इसकी पहचान है ही। इसके साथ इसकी पहचान हैं जयपुर के रंग-उत्सव।

रंग उत्सवों की नगरी जयपुर

रंग-उत्सव से हमारा तात्पर्य जयपुर में विभिन्न रंगमंचों पर खेले जाने वाले नाटकों से है। यूं तो जयपुर में जवाहर कला केंद्र, बिड़ला ऑडीटोरियम, महाराणा प्रताप सभागार और अन्य थिएटर मौजूद हैं लेकिन जो बात रवीन्द्र मंच सभागार में है वह कहीं और नहीं। उक्त वर्णित सभी सभागारों में समय समय पर कई प्रकार के आयोजन होते रहते हैं। कभी कोई उत्सव, कभी कोई मेला, तो कभी कोई व्यावसायिक गतिविधि। लेकिन जवाहर कला केंद्र एक मात्र ऐसा स्थान है जहां आपको सिर्फ और सिर्फ नाटक मिलेंगे।

रामनिवास बाग की दूसरी शान

रवीन्द्र मंच जयपुर परकोटा के ठीक दक्षिण में स्थित रामनिवास बाग के उत्तर पूर्वी किनारे पर स्थित है। जयपुर के सबसे सघन इलाके के ठीक बीच में स्थित होकर भी रवीन्द्र मंच अपने आप में एक तपस्वी की भांति मौन चुपचाप अकेला बैठा चिर तपस्या में लीन नजर आता है। रामनिवास बाग में मानसिंह सर्किल से पूर्व की ओर जाने वाले पथ पर रवीन्द्र मंच प्रेक्षाग्रह का यह भव्य भवन मौजूद है। खूबसूरत इमारत आधुनिक डिजाइन में बनी उस समय की अपने आप में पहली भव्य इमारत थी। इसका प्रेक्षाग्रह भी देश के सबसे बड़े सभागारों में गिना जाता है। इसके अलावा इस इमारत के पीछे एक ओपन थिएटर भी है जो लाल पत्थरों के गोलकार सीढीनुमा स्थापत्य में गढ़ा गया है। वर्तमान में प्रेक्षाग्रह के विकास का कार्य चल रहा है और यहां होने वाली गतिविधियों में भी तेजी आई है। रामनिवास बाग की पहली शान यहां स्थित अल्बर्ट हॉल म्यूजियम है। इसलिए रवीन्द्र मंच को रामनिवास बाग की दूसरी शान कहा जाता है।

नेहरू के संस्कृतिवाद की निशानी
जयपुर के रामनिवास बाग में स्थित रवीन्द्र मंच सभागार भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा 1961 में देश में स्थापित 17 सांस्कृतिक केंद्रों में से एक था। नागरिकों के लिए इस भव्य और ऐतिहासिक सभागार का उद्घाटन तात्कालीन संस्कृति मंत्री एच. कबीर ने 15 अगस्त 1963 को किया, और इसी के साथ जयपुर के इतिहास में ’रंग’ का अर्थ और भी व्यापक हो गया। नेहरू के संस्कृतिवाद की निशानी इस भव्य सभागार के नवीनीकरण पर 90 लाख रुपए खर्च कर प्रशासन ने इसे नया रूप और नया जीवन दे दिया है। वर्तमान में यहां वे सभी सुविधाएं मौजूद है जो एक थिएटर को भव्य थिएटर बनाती हैं। यहां ओपन थिएटर, मिनी थिएटर, चारों ओर हरा भरा वातावरण, पार्किंग, आर्ट गैलेरी, डागर आर्काइव आदि नागरिकों को सांस्कृतिक विकास की धारा में जोड़ने वाले साधन हैं।

उत्सवों की भरमार
रवीन्द्र मंच के नवीनीकरण के बाद यहां रंगात्सवों की बहार आ गई है। हाल ही के कुछ अरसे में यहां राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर के नाट्योत्सवों का आयोजन किया जा चुका है। एक समय गर्त की आरे जाती थिएटर विधा एक बार फिर से पुष्पित पल्लवित होती नजर आ रही है। एक बार फिर युवाओं का रूझान थिएटर की तरफ है। जिसमें रवीन्द्र मंच और यहां का प्रशासन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। रवीन्द्र मंच से निरंतर जुडे कलाकारों, लेखकों, रंग निर्देशकों और युवा प्रतिभाओं ने भी इसके विकास में छोटी छोटी किंतु अहम भूमिकाएं निबाही हैं।

इरफान खान जैसी प्रतिभाएं
रवीन्द्र मंच ने देश को इरफान खान जैसी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभाएं दी हैं। रात दिन रवीन्द्र मंच प्रेक्षाग्रह में नाटकों की रिहर्सल में जुटे कलाकारों में से ही कोई एक दिन अचानक बड़े पर्दे पर दिखाई देने लगाता है। ‘पान सिंह तोमर’ के लिए बेस्ट एक्टर का राष्ट्रीय खिताब पा चुके इरफान का कहना है कि जयपुर का रवीन्द्र मंच उनकी पहली पाठशाला है। रवि झांकल जैसे मंझे हुए कलाकार भी जयपुर थिएटर की ही देन हैं।

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आज भी कभी जब आप रवीन्द्र केंद्र के करीब से गुजरते होंगे तो आपको एक साथ दो हुंकारें सुनाई देती होंगी। एक हुंकार रवीन्द्र मंच की दीवार से सटे चिड़ियाघर के बाघों की होती है तो दूसरी हुंकार प्रेक्षाग्रह के भीतर रिहर्सल कर रहे किसी युवा कलाकार की। रवीन्द्र मंच ने अभिनय के खुले शेरों का एक बड़ा समूह तैयार किया है।

रवीन्द्र मंच – डागर आर्काइव

डागर परिवार ने जयपुर को ध्रुपद गायन के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर विख्यात किया। पद्मभूषण उस्ताद अल्लाह बंदे रहीमुद्दीन खान डागर जानमाज पर बैठकर रियाज करने से पहले नमाज  पढ़ा करते थे। ध्रुपद गायन को अल्लाह की बंदगी की तरह मानने वाले डागर परिवार में महिलाओं के गायन पर पाबंदी थी। इसी कारण डागर परिवार की सदस्या शबाना डागर कभी ध्रुपद गायन नहीं कर सकीं। लेकिन उन्हें ध्रुपद से  प्यार बहुत था। वे घंटों बैठकर ध्रुपद का रियाज सुना करती थी। ध्रुपद गायन में तो वे कुछ नहीं कर सकी लेकिन ध्रुपद के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। जयपुर के रवीन्द्र मंच प्रेक्षागृह के दूसरे तल पर  ’डागर आर्काइव’ में शबाना ने अपने परिवार की ऐतिहासिक यादों को बखूबी सहेजा है। उन्होंने यहां सौ साल  पुराने साजों को उनके नाम और ध्रुपद में इस्तेमाल होने के स्थानों के साथ संजोया है। इतना  ही नहीं,  यहां डागर परिवार के महत्वपूर्ण ध्रुपद गायकों के इतिहास  और  उनकी वस्तुओं को भी रखा  गया है। इन महत्वपूर्ण वस्तुओं में डागर परिवार  की मौसिकी पर आधारित कई वर्षों से  संजोई गई किताबें, उस्ताद रहीमुद्दीन खान डागर का जानमाज और उस्ताद अल्लाह बंदे इमामुद्दीन खान डागर का तानपूरा भी शामिल है।

संगीत के शोध विद्यार्थियों के लिए डागर आर्काइव महत्वपूर्ण लाईब्रेरी है। यहां आने वालों के साथ शबाना बड़ी आत्मीयता से मिलती हैं और लोगों को डागर परिवार और उनके ध्रुपद प्रेम के बारे में बहुत सी बातों का जिक्र करती हैं। तो अब अगर आप कभी  रवीन्द्र मंच पर  कोई नाटक देखने जाएं तो डागर आर्काइव का  दौरा  जरूर करें।

कब बदलेगा रंग रूप

जयपुर के सबसे प्रमुख प्रेक्षागृह रवीन्द्र मंच की सूरत बदलने में वक्त लगेगा। मंच का टैगोर कल्चरल कॉम्प्लेक्सेज स्कीम के तहत रिनोवेशन और अपग्रेडेशन होना है लेकिन प्रशास8न की उदासीनता के कारण दो साल से काम अटका हुआ है। रवीन्द्र मंच प्रशासन प्रोजेक्ट में देरी के कारण नेशनल अप्रेरल कमेटी की मेंबर संजना कपूर के विजिट पर नहीं आने को बता रहा है। रवींद्र नाथ टैगोर की 150 वीं जयंती के सिलसिले में केंद्र सरकार कीओर से टैगोर कल्चरल कॉम्प्लेक्स स्कीम के तहत रवींद्र मंच को फुल फ्लेज्ड कल्चरल सेंटर के रूप में डवलप किया जाना है।

प्रोजेक्ट में देरी

रवींद्र मंच प्रबंध अधिकारी नीतू राजेश्वर का कहना है कि प्रोजेक्ट में देरी की वजह डीपीआर को नेशनल अप्रैजल कमेटी का अप्रूवल नहीं मिलना है। राज्य सरकार ने एक करोड का फंड रिलीज कर दिया है। इससे मंच पर एसी लगवाया था। हम चाहते हैं कि जल्द से अप्रूवल मिल जाए, ताकि रिनोवेशन का काम शुरू हो।

सुविधाओं की कमी

रवीन्द्र मंच के मौजूदा रिहर्सल हॉल की स्थिति अच्छी नहीं है और न ही थिएटर आर्टिस्ट के लिए स्टेज प्रॉपर्टी की सुविधाएं हैं। रंगकर्मी संजय विद्रोही का कहना है कि कला के विकास के लिए सुविधाओं का होना जरूरी है। रिहर्सल हॉल में लाइट की व्यवस्था होनी चाहिए। स्टेज के लिए प्रॉपर्टी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। रंगकर्मी दिलीप भट्ट का का कहना है कि रवींद्र मंच के रिनोवेशन प्रोजेक्ट के बारे में काफी समय से सुनने में आ रहा है, लेकिन अब तक यह इंप्लीमेंट नहीं हो पाया।

मिलेगा मार्डन टच

प्रोजेक्ट के तहत ऑडीटोरियम, आर्ट गैलरीज, रिहर्सल हॉल, कैफेटेरिया, लाईब्रेरी आदि बनाए जाएंगे। ताकि ज्यादा से ज्यादा कार्यक्रम यहां आयोजित किए जा सकें। प्रोजेक्ट केलिए सेंट्रल गवर्नमेंट की ओर से साठ फीसदी और स्टेट गवर्नमेंट की ओर से चालीस फीसदी फंड दिया जाएगा। प्रोजेक्ट के तहत पुराने भवन को मॉडर्न टच देने और मल्टीफेसेलिटी प्रोवाइड कराने के लिए रिनोवेट किया जाएगा। नया ऑडिटोरियम, कैफेटेरिया, लाइब्रेरी और रिहर्सल हॉल भी बनेगा।

14 करोड का अप्रूवल

पिछले साल अप्रैल में सेंट्रल कल्चरल मिनिस्ट्री से 14 करोड का सैद्धांतिक अप्रूवल मिला था। इसके बाद नेशनल अप्रेजल कमेटी के मेंबर निसार अलाना विजिट पर आए। उन्होंने डिजाइन और टेक्निकल इश्यूज पर सुझाव दिए। जिसके अनुसार डीपीआर में चेंजेज करके भेजे गए। अब संजना कपूर की  विजिट का इंतजार है। क्योंकि वे प्रोग्रामिंग से जुडे जरूरी सुझाव देंगी। इसके बाद ही काम शुरू करने का अप्रूवल मिल पाएगा।

विकास : बनेगा कैफेटेरिया

रवींद्र मंच कंपस में अब कैफेटेरिया भी होगा। टैगोर कल्चरल कॉम्प्लेक्स स्कीम के तहत रवींद्र मंच का रिनोवेशन, अपग्रेडेशन और मॉर्डनाइजेशन किया जाना है। इसी प्रोजेक्ट में अब मंच में कैफेटेरिया बनाया जाएगा। जिससे यहां आने वाले कला प्रेमियों को कला के बारे में डिसकशन करने और खाने पीने की सुविधाएं भी मिल सकेंगी। यहां कैफेटेरिया ओपन एयर थिएटर के सामने की ओर खाली लैंड में बनाए जाने की योजना है। इसके ऊपर गेस्ट हाउस और नीचे मल्टीपर्पज हॉल भी बनाए जाएंगे। कलाकारों की मानें तो मंच में कई वर्षों से कैफेटेरिया बनाने की डिमांड की जा रही थी। कलाकारों के मुताबिक यदि मंच में फुटफॉल बढाना है तो कैफेटेरिया जैसी योजनाएं जरूरी हैं। जानकारी के अनुसार रवींद्र मंच की ओर से पिछले साल डीटेल्ड प्रोजक्ट रिपोर्ट सेंट्रल गर्वनमेंट को भिजवाई गई थी। इसमें मंच पर कैफेटेरिया बनाने का भी प्रपोजल शामिल था। लेकिन अगस्त में मंच की विजिट पर आए मेंबर निसार अलाना ने कैफेटेरिया के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। इसके बाद हाल ही नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में हुई एक मीटिंग में नेशनल अप्रेजल कमटी के सदस्यों ने कैफेटेरिया बनाने के लिए भी सहमति दे दी है। इस बैठक में आर्किटैक्ट के टी रवींद्रन, नेशनल स्कूल आफ ड्रामा के त्रिपुरारी शर्मा और रवींद्र मंच प्रबंधक नीतू राजेश्वर शामिल हुए थे।

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लोक संगीत एवं नृत्य

लोक संगीत एवं नृत्य

मनुष्य स्वभाव से ही संगीत प्रेमी होता है। यही कारण है कि संगीत चाहे किसी भी प्रदेश अथवा समुदाय का हो सबके मन को आकर्षित करता है। लगभग सभी प्रदेशों का अपना-अपना लोक संगीत होता है। इसमें वहाँ की परम्पराएँ, रीति-रिवाज, विभिन्न संस्कार, आध्यात्कि विश्वास, सामाजिक उत्सव आदि का समावेश होता है। हमारे राजस्थान का लोक संगीत राजस्थान के जन-जीवन का प्रमुख अंग है। यह शास्त्रीय संगीत के नियमों के बंधन से परे है। हमारे कुछ प्रमुख लोकगीतों का वर्णन इस प्रकार है।
पणिहारी – यह पनघट से जुड़े लोक गीतों में सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसमें पतिव्रत धर्म पर अटल पणिहारिन व पथिक के संवाद को गीत रूप में गाया जाता है। जैसे – कुण रे खुदाया कुआँ, बावड़ी ए पणिहारी जी रे लो।

मिरगा नैणी जी रे लो,

कुणरे बंधाया भीम तलाव, वाला जी

गोरबंद – गोरबंद ऊँट के गले का एक आभूषण होता है। इस गीत से ऊँट के ाृंगार का वर्णन मिलता है। जैसे –

लड़ली लूमा झूमा ए, म्हारो गोरबंध नखरालो,

आली जा म्हारो गोरबंध नखरालो।

ओलदूं – ओलदूं का मतलब किसी स्नेहीजन को याद करने से है। यह विरहिणी स्त्रियों द्वारा पति की याद में गाया जाता है।

‘ओ जी ओ गोरी रा लसकरिया ओल्यूंडी लगा थे

कोठै चाल्याजी ठोला …………………………….

हिचकी भी इसी प्रकार का लोकगीत है।
मोरियो – मोर के लिए गाया जाने वाले गीत को मोरिया गीत कहते है। यह प्रमुख लोकगीत है।
मोरियों आछौ बोल्यौ रे ठलती रात मां,

म्हारे हिवडै में त्हैगी रे कटार मोरियां ………।

आछौ बौल्यौ रे ढलती रात मां ………।

वर्षा ऋतु के गीत – वर्षा ऋतु से संबंधित गीत वर्षा ‘ऋतु गीत’ कहलाते है।  वर्षा ऋतु में बहुत से सुन्दर गीत गाये जाते है। इस गीत में वर्षा ऋतु को सुरंगी ऋतु की उपमा दी गई है।

‘ओ कुण बीजै बाजरौ ए बादली

ओ कुण बीजै मोठ, मेवा, मिसरी,

सुरंग ऋतु आई म्हारा देस में,

भली रे ऋतु आई म्हारा देस में।

विनायक – विनायक (गणेश) मांगलिक कार्यो के देवता है। अत: मांगलिक कार्य एवं विवाह के अवसर पर सर्वप्रथम विनायक जी का गीत गाया जाता है। गीत इस प्रकार से है –

‘चालो ओ, विनायक आपां जोसीड़ा रेचालां,

आछा-आछा लगन लिखावां ओ गजानन

ओ म्हारा बिड़द विनायक

बना-बनी – हमारी संस्कृति के अनुसार जिस युवक व युवती की शादी होने वाली होती है, उस युवक को बना तथा युवती को बनी कहा जाता है। विवाह के अवसर बना-बनी बनकर जो गीत गाये जाते है। ‘बना-बनी’ कहलाते है। बना-बनी के गीत प्रकार से है।

बनो तो म्हारै रामचन्द्र अवतार,

बनी तो म्हारी सीता जानकी….।

इस गीत का अर्थ भी इस प्रकार से है कि परिवार वाले ‘बना’ बने अपने लड़के की विशेषता बता रहे है कि हमारा बना तो श्री रामचन्द्र का अवतार जैसा है और बनी के परिवार वाले अपनी बेटी की प्रशंसा में उत्तर देते हुए कहते है कि अगर आपका बना रामचन्द्र अवतार है, तो हमारी बनी अर्थात् पुत्री जानकी सीता है।
लोकभजन – हमारी संस्कृति ने देवी-देवताओं का विशिष्ट स्थान है। किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए लोकभजनों द्वारा इष्ट को प्रसन्न किया जाता है। कुछ लोकभजन इस प्रकार से है –
‘बाजे छै नौबत बाजा, म्हारा डिग्गीपुरी का राजा

‘म्ह हेलो देती आई म्हारी माय, सोना रा झांझर बाजणा’

खम्मा खम्मा खम्मा रे कंवर अजमाल जी रा ………..

लोकनृत्य – लोकगीतों के साथ किए जाने वाले नृत्य लोकनृत्य कहलाते है। प्रमुख लोकनृत्य भवई, घूमर, गीदड़, तेराताली कालबेलिया, अग्निनृत्य, चरी आदि है। ये नृत्य विभिन्न अवसरों पर देखे जा सकते है।
लोक संगीत एवं नाट्य